🌍 बड़ी खबर | कोटा-बेलगहना, बिलासपुर:- ग्रामीणों ने पूर्व तहसीलदार पर लगाए गंभीर आरोपग्रामीणों की शिकायत के अनुसार, खसरा नंबर 801/1(क), जिसका रकबा लगभग 13 एकड़ बताया जा रहा है, वर्ष 1954-55 से शासकीय पाठशाला एवं चारागाह के लिए आरक्षित रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि पूर्व तहसीलदार रोशन साहू के कार्यकाल में इस भूमि के राजस्व रिकॉर्ड और नक्शे में कथित रूप से अनियमितताएं की गईं। इस संबंध में पटवारी रामकुमार चेलके की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।शिकायत में खसरा नंबर 801/25, 801/53 और 801/62 में भूमि विभाजित किए जाने तथा निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज होने का उल्लेख किया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि विवादित भूमि पर पूर्व में स्थगन आदेश (स्टे) भी था।हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, संबंधित राजस्व अभिलेखों की जांच और अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी आवश्यक है। किसी अधिकारी या व्यक्ति की जिम्मेदारी जांच और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के बाद ही निर्धारित की जा सकती है। 12 अक्टूबर को सीमांकन की प्रक्रिया पर फिर उठे सवालग्रामीणों के अनुसार, सोमवार 12 अक्टूबर 2026 को सीमांकन के लिए दोपहर 2 बजे का समय निर्धारित किया गया था। उनका आरोप है कि अधिकारी करीब 5 बजे पहुंचे और उन्हें अपेक्षित कार्रवाई के बिना वापस होना पड़ा। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गई।ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि जब भूमि सरकारी उपयोग के लिए आरक्षित बताई जा रही है और लंबे समय से विवाद चल रहा है, तो सीमांकन की प्रक्रिया को स्पष्ट समयसीमा में पूरा क्यों नहीं किया जा रहा है?ग्रामीणों की मांग है कि सीमांकन की अगली तारीख लिखित रूप में दी जाए, पंचायत एवं संबंधित पक्षों को समय से सूचना मिले और पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी कराकर रिपोर्ट तैयार की जाए। मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री और स्थानीय विधायक से जनहित में हस्तक्षेप की मांगइस मामले में ग्रामीणों की ओर से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री श्री टंकराम वर्मा तथा कोटा विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री अटल श्रीवास्तव से हस्तक्षेप की मांग की जाती है। राज्य के राजस्व विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर श्री टंकराम वर्मा को राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री बताया गया है।ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं: निष्पक्ष जांच: पूर्व तहसीलदार रोशन साहू के कार्यकाल में हुए कथित राजस्व रिकॉर्ड और नक्शा संबंधी बदलावों की जांच हो। समयबद्ध सीमांकन: ग्राम पंचायत को लिखित सूचना देकर सभी संबंधित पक्षों की उपस्थिति में निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए। राजस्व रिकॉर्ड की जांच: पुराने मिसल, खसरा, बी-1, भू-नक्शा, नामांतरण आदेश और कथित स्थगन आदेश का मिलान किया जाए। शासकीय भूमि की सुरक्षा: यदि जांच में अवैध कब्जा या गलत प्रविष्टियां प्रमाणित हों, तो कानून के अनुसार उन्हें सुधारने और भूमि को सुरक्षित करने की कार्रवाई हो। जवाबदेही तय हो: सीमांकन में देरी और पूर्व कार्रवाई के संबंध में प्रशासन लिखित जवाब दे तथा दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई करे। प्रशासन से सीधे सवाल क्या खसरा नंबर 801/1(क) वास्तव में पाठशाला एवं चारागाह के लिए आरक्षित है? क्या इस भूमि पर प्रभावी स्थगन आदेश था? यदि हां, तो उसकी शर्तें क्या थीं? किस आदेश के आधार पर उपखसरों का विभाजन और निजी नामों की प्रविष्टियां दर्ज की गईं? 12 अक्टूबर को निर्धारित समय पर सीमांकन क्यों नहीं हो सका?अगली तारीख क्या है और जांच रिपोर्ट कब तक सार्वजनिक की जाएगी?सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव का पक्ष: शासकीय भूमि सार्वजनिक संपत्ति है। यदि किसी आरक्षित भूमि के रिकॉर्ड में नियम विरुद्ध बदलाव हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और नियमानुसार सुधार होना चाहिए। साथ ही, किसी व्यक्ति पर आरोप को बिना प्रमाण दोष सिद्ध नहीं माना जा सकता। प्रशासन को दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि ग्रामीणों का भरोसा बना रहे और विवाद का कानूनसम्मत समाधान हो।


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