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देश पहले, राजनीति बाद में: युवाओं की ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगे या राजनीतिक संघर्षों में?लोकतंत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राष्ट्रहित पर उठते सवालों के बीच युवाओं से विचार करने की अपील….

विचार लेख | पुष्पेन्द्र सिंह

🌍 सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव :- देश के युवाओं के भीतर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने, भ्रष्टाचार का विरोध करने और देश के स्वाभिमान की रक्षा करने का जुनून आखिर कहां है? क्या आज का युवा अपने विवेक और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर निर्णय ले रहा है, या वह राजनीतिक दलों की रणनीतियों में उलझकर अपनी वास्तविक जिम्मेदारियों से दूर होता जा रहा है?

यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र, युवाओं की भूमिका और देश के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।युवाओं को राजनीतिक मोहरा बनने से बचना होगाआज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी मुद्दे पर आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अभियान तेजी से फैल जाते हैं। ऐसे में युवाओं को यह समझना आवश्यक है कि किसी आंदोलन का उद्देश्य क्या है, उसके पीछे कौन-से तथ्य हैं और उससे समाज को क्या लाभ या नुकसान हो सकता है।यदि किसी आंदोलन में विदेशी संगठनों, आर्थिक सहायता या बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका होने का आरोप लगाया जाता है, तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति या संगठन को दोषी ठहराना भी उचित नहीं है।युवाओं को न तो आंख मूंदकर किसी राजनीतिक दल का समर्थन करना चाहिए और न ही बिना प्रमाण किसी के विरोध में खड़ा होना चाहिए। उनका सबसे बड़ा हथियार शिक्षा, विवेक, संवैधानिक समझ और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता होना चाहिए।

नेहा बोरा और AISA से जुड़े विवादों पर तथ्य सामने आएंनेहा बोरा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़े विवादों को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर भी तथ्यों के आधार पर चर्चा आवश्यक है। संबंधित व्यक्तियों और संगठनों के वास्तविक बयान, उनका संदर्भ, उपलब्ध दस्तावेज और प्रमाण जनता के सामने आने चाहिए।वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत और बाटला हाउस मुठभेड़ जैसे संवेदनशील विषयों पर राजनीतिक तथा वैचारिक बहस होती रही है।इन मामलों पर किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका का आकलन उसके प्रमाणित बयानों, दस्तावेजों और वास्तविक गतिविधियों के आधार पर होना चाहिए। किसी के खिलाफ आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा।

एक बात स्पष्ट है—हिंसा का समर्थन, निर्दोष लोगों की हत्या या सुरक्षा बलों पर हमलों का औचित्य सिद्ध करने की कोशिश किसी भी विचारधारा के नाम पर स्वीकार्य नहीं हो सकती। साथ ही, लोकतांत्रिक असहमति और हिंसा के समर्थन के बीच अंतर करना भी उतना ही जरूरी है।चुनाव आयोग पर सवाल उठाना गलत है या लोकतांत्रिक अधिकार?भारत में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियाद है।यदि किसी राजनीतिक दल को चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता का संदेह है, तो उसे प्रमाणों के साथ अपनी शिकायत सामने रखनी चाहिए।

आयोग से जवाब मांगना, उपलब्ध आंकड़ों की जांच की मांग करना और कानूनी उपाय अपनाना लोकतांत्रिक अधिकार हैं।लेकिन क्या चुनाव आयोग पर सवाल उठाने का पैमाना चुनावी जीत और हार के अनुसार बदलना चाहिए? क्या किसी दल को अपनी जीत के समय चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा और हार के समय संदेह करना चाहिए?इन सवालों पर सभी राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए।हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में अलग-अलग समय पर कांग्रेस या उसके सहयोगियों की सरकारें बनी हैं। वहीं भाजपा भी अनेक राज्यों में सत्ता से बाहर रही है। यह भारतीय लोकतंत्र की सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।हालांकि, अलग-अलग राज्यों के चुनावी परिणाम अपने आप में चुनाव आयोग की निष्पक्षता या किसी आरोप की सत्यता का अंतिम प्रमाण नहीं होते। प्रत्येक शिकायत का मूल्यांकन उसके विशिष्ट तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।

बैलेट पेपर और EVM पर बहस में एक ही पैमाना जरूरी चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), बैलेट पेपर और चुनावी पारदर्शिता को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है।यदि किसी चुनाव में बैलेट पेपर का इस्तेमाल हुआ और कोई दल अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाया, तो उसके परिणामों का विश्लेषण भी संगठन, उम्मीदवारों, स्थानीय परिस्थितियों और मतदाताओं की पसंद के आधार पर होना चाहिए।इसी प्रकार EVM से जुड़े आरोपों की जांच भी तकनीकी और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।कर्नाटक, त्रिपुरा या किसी अन्य राज्य के पंचायत अथवा स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर कोई विशेष दावा किया जाता है, तो पहले संबंधित चुनाव की प्रक्रिया, मतदान प्रणाली और आधिकारिक परिणामों की पुष्टि की जानी चाहिए। केवल चुनावी नतीजों के आधार पर किसी मशीन, संस्था या दल को दोषी ठहराना उचित नहीं है।लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवालों का जवाब भी तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही तलाशना चाहिए।भाजपा और RSS का विरोध करना भी लोकतांत्रिक अधिकारभारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को विचार व्यक्त करने, शांतिपूर्ण विरोध करने और राजनीतिक विचारधारा चुनने का अधिकार देता है।

भाजपा और RSS की नीतियों या विचारों का समर्थन करना किसी नागरिक का अधिकार है। उसी तरह उनका विरोध करना और उनकी आलोचना करना भी लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में आता है।इसी कसौटी पर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वामपंथी संगठनों और अन्य राजनीतिक समूहों की गतिविधियों का भी मूल्यांकन होना चाहिए।किसी भी संगठन को केवल उसकी विचारधारा के आधार पर देशविरोधी कहना उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन पर हिंसा भड़काने, गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने या विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आरोप है, तो उसकी जांच सक्षम संस्थाओं को कानून के अनुसार करनी चाहिए।देश की संस्थाओं की आलोचना और उन्हें कमजोर करने के इरादे से गलत सूचना फैलाने के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।क्या भारत में नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका जैसी परिस्थितियों की आशंका उचित है?

भारत की तुलना नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका की राजनीतिक परिस्थितियों से करते हुए आंदोलन और सत्ता परिवर्तन की चर्चा कभी-कभी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनती है।लेकिन प्रत्येक देश का राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक संदर्भ अलग होता है। किसी दूसरे देश में हुए घटनाक्रम को भारत में दोहराने की बात करना अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है। ऐसे किसी दावे की सत्यता उसके वास्तविक संदर्भ और उपलब्ध प्रमाणों से ही निर्धारित की जा सकती है।भारत की समस्याओं का समाधान भारतीय संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष जांच और शांतिपूर्ण जनभागीदारी के माध्यम से तलाशना चाहिए।विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े किसी भी आरोप को भी प्रमाणों के आधार पर परखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर।युवाओं की ऊर्जा टकराव में नहीं, देश निर्माण में लगेजब भी किसी आंदोलन के दौरान युवाओं और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बनती है, तब सभी पक्षों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

प्रशासन को कानून के अनुसार और नागरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए कार्रवाई करनी चाहिए। आंदोलनकारियों को भी शांतिपूर्ण विरोध, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और कानून के दायरे का ध्यान रखना चाहिए।युवाओं को यह समझना होगा कि उनका भविष्य केवल राजनीतिक नारों से नहीं बनेगा। शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक सोच, नशामुक्त समाज, भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता, महिलाओं की सुरक्षा और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी से देश मजबूत होगा।यदि युवा अपनी ऊर्जा का उपयोग सकारात्मक सामाजिक बदलाव में करते हैं, तो वही वास्तविक राष्ट्रसेवा होगी।राहुल गांधी और सभी राजनीतिक दलों से कुछ सवालक्या चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते समय सभी राजनीतिक दल समान मानदंड अपनाने के लिए तैयार हैं?यदि चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर आपत्ति है, तो क्या संबंधित दल प्रमाणों और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से उसका समाधान तलाशेंगे?

क्या राजनीतिक दल युवाओं को रोजगार, शिक्षा, नशामुक्ति और भ्रष्टाचार के विरुद्ध ठोस कार्यक्रम देने के लिए तैयार हैं?क्या राजनीतिक विरोध के दौरान संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनके प्रति जनता का भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभाई जाएगी?क्या सभी दल अपने समर्थकों से अपील करेंगे कि वे अफवाहों, अप्रमाणित आरोपों और हिंसक टकराव से दूर रहें?ये सवाल केवल कांग्रेस या विपक्ष के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे दलों और देश के प्रत्येक राजनीतिक संगठन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।राष्ट्रभक्ति का अर्थ क्या है?राष्ट्रभक्ति केवल नारों, सोशल मीडिया पोस्ट या किसी विशेष विचारधारा के समर्थन तक सीमित नहीं हो सकती। इसका अर्थ है देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, संविधान का सम्मान करना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना और समाज के कमजोर वर्गों के साथ खड़ा होना।राष्ट्रहित के नाम पर किसी नागरिक की लोकतांत्रिक आवाज को दबाना उचित नहीं है। उसी तरह लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर हिंसा, नफरत या अप्रमाणित आरोपों को बढ़ावा देना भी उचित नहीं है।भारत की असली ताकत उसकी विविधता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता की विवेकपूर्ण भागीदारी में है।युवा साथियों, किसी नेता के समर्थक बनने से पहले जागरूक नागरिक बनिए। किसी विचारधारा को अपनाने से पहले तथ्यों को समझिए। किसी आंदोलन में शामिल होने से पहले उसके उद्देश्य और तरीकों पर विचार कीजिए।सरकार से सवाल पूछिए, विपक्ष से जवाब मांगिए और सभी संस्थाओं को जवाबदेह बनाने की मांग कीजिए। लेकिन हर मामले में प्रमाण, संविधान और न्याय को अपना आधार बनाइए।

अंत में एक संदेश स्पष्ट है—यदि किसी राजनीतिक दल की रणनीति सफल नहीं हो रही, तो उसे अपनी नीतियों, नेतृत्व और कार्यशैली की समीक्षा करनी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप हो, तो उसका समाधान प्रमाणों और कानून के आधार पर होना चाहिए।देश पहले, राजनीति बाद में। संविधान सर्वोपरि, लोकतंत्र मजबूत और युवा जागरूक हों।

भारत माता की जय

🌍 विचार: पुष्पेन्द्र सिंह (भाजपा प्रदेश सह संयोजक सत्कार प्रकोष्ठ )

प्रस्तुति: सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव