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पार्ट-2: सरकारी जमीन के विवाद पर अब तक कार्रवाई नहीं, ग्रामीणों का सवाल—आखिर कब जागेगा शासन-प्रशासन?

खसरा नंबर 801/1(क) की भूमि को लेकर ग्रामीणों की शिकायतें बरकरार; मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री, विधायक और प्रशासन से फिर हस्तक्षेप की मांग

सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव | जनहित विशेष रिपोर्ट

🌍 छत्तीसगढ़। शासकीय पाठशाला एवं चारागाह के लिए आरक्षित बताई जा रही भूमि से जुड़े विवाद में ग्रामीणों की शिकायतों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आने का आरोप लगाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं और सीमांकन की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर सार्वजनिक उपयोग की भूमि से जुड़े इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी कब स्पष्ट जवाब देंगे?

ग्रामीणों की शिकायत के अनुसार, खसरा नंबर 801/1(क), जिसका रकबा लगभग 13 एकड़ बताया जा रहा है, वर्ष 1954-55 से शासकीय पाठशाला एवं चारागाह के लिए आरक्षित रही है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि पूर्व तहसीलदार रोशन साहू के कार्यकाल में राजस्व रिकॉर्ड और भू-नक्शे में कथित गड़बड़ियां हुईं। शिकायत में पटवारी रामकुमार चेलके की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, खसरा नंबर 801/25, 801/53 और 801/62 में भूमि विभाजन तथा निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज होने की जांच की मांग की गई है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। संबंधित राजस्व अभिलेख, आदेश और अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

पार्ट-1 के बाद भी कार्रवाई का इंतजार, ग्रामीणों में नाराजगी

इस मामले में ग्रामीणों ने पहले भी सीमांकन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उनके अनुसार, 12 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2 बजे सीमांकन निर्धारित था, लेकिन अधिकारी कथित रूप से करीब 5 बजे पहुंचे और अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं हो सकी। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद भी उन्हें स्पष्ट समाधान और अगली कार्रवाई को लेकर संतोषजनक जानकारी नहीं मिली है।

अब ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन केवल आश्वासन देने तक सीमित न रहे, बल्कि जांच, सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड के सत्यापन की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करे।

मुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री से सीधा सवाल—जनहित के मामले में जवाबदेही कब?

ग्रामीणों की ओर से मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री श्री टंकराम वर्मा, कोटा विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री अटल श्रीवास्तव तथा संबंधित जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की जा रही है।

जनहित में प्रशासन से पांच प्रमुख सवाल:

  1. खसरा नंबर 801/1(क) की मूल राजस्व स्थिति क्या है और क्या यह भूमि शासकीय पाठशाला एवं चारागाह के लिए आरक्षित है?
  2. यदि भूमि के रिकॉर्ड में बदलाव हुआ है, तो वह किन आदेशों और दस्तावेजों के आधार पर किया गया?
  3. ग्रामीणों द्वारा उठाई गई शिकायतों की जांच किस स्तर पर है?
  4. सीमांकन की अगली तारीख कब निर्धारित होगी और संबंधित पक्षों को लिखित सूचना कब दी जाएगी?
  5. शिकायतों पर की गई कार्रवाई की जानकारी ग्रामीणों को लिखित रूप में कब उपलब्ध कराई जाएगी?

प्रशासन से मांग: दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करें

ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि पुराने मिसल रिकॉर्ड, खसरा अभिलेख, बी-1, भू-नक्शे, नामांतरण आदेश और यदि कोई स्थगन आदेश प्रभावी था तो उसकी प्रमाणित प्रति का परीक्षण कराया जाए। इसके बाद सभी संबंधित पक्षों की उपस्थिति में पारदर्शी सीमांकन कराकर रिपोर्ट तैयार की जाए।

यदि जांच में राजस्व रिकॉर्ड में नियम विरुद्ध प्रविष्टियां, अवैध कब्जा अथवा अन्य अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो कानून के अनुसार सुधार और कार्रवाई की जाए। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो प्रशासन तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे।

जनहित का सवाल: सरकारी भूमि की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी?

सरकारी उपयोग के लिए आरक्षित भूमि का विवाद केवल सीमांकन तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, ग्रामीणों के अधिकारों और राजस्व प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी विवाद को और बढ़ा सकती है तथा आम लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर कर सकती है।

सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव का सवाल है: जब ग्रामीण लगातार शिकायत कर रहे हैं, तो संबंधित प्रशासन की ओर से जांच की स्थिति, सीमांकन की तारीख और कार्रवाई की समयसीमा सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? यदि शिकायत में तथ्य हैं, तो उन पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; और यदि कोई आरोप गलत है, तो उसका भी दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

समाचार प्रकाशित किए जाने तक इस मामले में कार्रवाई नहीं होने की बात ग्रामीणों की ओर से कही जा रही है। संबंधित अधिकारियों, पूर्व तहसीलदार, पटवारी और जनप्रतिनिधियों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

न पक्ष, न विपक्ष — केवल निष्पक्ष जनहित।

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