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डिजिटल पत्रकारिता की आड़ में कथित अवैध वसूली पर उठे सवाल, बिलासपुर प्रेस क्लब ने शासन-प्रशासन को सौंपा ज्ञापन…

👉 सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरों और विज्ञापन के नाम पर दबाव बनाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग; डिजिटल पत्रकारिता के लिए न्यूनतम 5 वर्ष का अनुभव अनिवार्य करने का भी सुझाव

🌍 बिलासपुर :- सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच पत्रकारिता के नाम पर कथित भ्रामक समाचार प्रसारित करने और विज्ञापन दिलाने अथवा समाचार प्रकाशित करने के नाम पर अवैध वसूली किए जाने की शिकायतों को लेकर बिलासपुर प्रेस क्लब ने गंभीर चिंता जताई है। इस संबंध में प्रेस क्लब ने राज्य शासन के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिरीक्षक, कलेक्टर बिलासपुर एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को ज्ञापन सौंपकर राज्य स्तर पर पारदर्शी व्यवस्था बनाने और शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।

प्रेस क्लब द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि बिलासपुर जिले में इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब सहित विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वयं को पत्रकार बताने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा कथित रूप से अपुष्ट एवं भ्रामक वीडियो प्रसारित किए जाने तथा विज्ञापन और समाचार प्रकाशन के नाम पर अनुचित दबाव बनाने अथवा अवैध वसूली की शिकायतें सामने आ रही हैं। इन शिकायतों की तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आवश्यक है।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह मामला केवल किसी व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध प्रशासनिक व्यवस्था, आम नागरिकों के विश्वास, डिजिटल सूचना की विश्वसनीयता और जिम्मेदार पत्रकारिता की प्रतिष्ठा से है। ऐसी शिकायतों पर निष्पक्ष जांच नहीं होने से वास्तविक एवं ईमानदार पत्रकारों की छवि भी प्रभावित हो सकती है।

बिलासपुर प्रेस क्लब की प्रमुख मांगें

प्रेस क्लब ने शासन-प्रशासन के सामने छह प्रमुख मांगें रखी हैं—

  1. डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से समाचार प्रसारित करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों की जांच के लिए संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया जाए।
  2. सरकारी विज्ञापन जारी करने, स्वीकृति प्रदान करने और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं तथा शिकायत निवारण व्यवस्था पारदर्शी बनाई जाए।
  3. विज्ञापन के नाम पर कथित अवैध वसूली के मामलों की उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सक्षम एजेंसियों से जांच कराई जाए।
  4. भ्रामक अथवा अपुष्ट समाचार सामग्री प्रसारित करने के मामलों में लागू कानूनों के तहत निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
  5. वास्तविक डिजिटल पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, समाचार संस्थानों और आम नागरिकों के वैध अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करते हुए गैरकानूनी गतिविधियों पर कार्रवाई की जाए।
  6. इस विषय पर राज्य स्तर पर एक उपयुक्त शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आवश्यक पहल की जाए।

डिजिटल पत्रकारिता के लिए न्यूनतम पांच वर्ष के अनुभव का सुझाव

ज्ञापन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से न्यूज पोर्टल संचालित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की गई है। प्रेस क्लब ने केंद्र एवं राज्य सरकार से इस क्षेत्र में ठोस दिशा-निर्देश तैयार करने की मांग करते हुए सुझाव दिया है कि डिजिटल न्यूज पोर्टल और पत्रकारिता के नाम पर कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए न्यूनतम पांच वर्ष का पत्रकारिता अनुभव अनिवार्य करने पर विचार किया जाए।

यह अनुभव प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा किसी मान्यता प्राप्त समाचार संस्था में कार्य करने के आधार पर निर्धारित करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही, यदि कोई संस्था निजी लाभ, जान-पहचान अथवा अनुचित फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र जारी करती है, तो ऐसे मामलों की भी गहन जांच कर दोष प्रमाणित होने पर संबंधित लोगों के विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी

डिजिटल मीडिया आज सूचना प्रसारण का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। सोशल मीडिया ने आम नागरिकों और स्वतंत्र पत्रकारों को अपनी बात रखने का अवसर दिया है। ऐसे में किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य वास्तविक पत्रकारिता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक रोक लगाना नहीं, बल्कि पत्रकारिता के नाम पर होने वाली कथित गैरकानूनी गतिविधियों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए।

अब देखना होगा कि राज्य शासन और जिला प्रशासन इस ज्ञापन को कितनी गंभीरता से लेते हैं तथा डिजिटल पत्रकारिता की विश्वसनीयता, सरकारी विज्ञापन व्यवस्था में पारदर्शिता और कथित अवैध वसूली की शिकायतों पर क्या कदम उठाते हैं।

जनहित का सवाल: पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसकी स्वतंत्रता की रक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी इसकी विश्वसनीयता और जवाबदेही भी है। जांच साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए और किसी भी व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।