बिलासपुर | छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और यहाँ के पारंपरिक खान-पान को सहेजने का महापर्व ‘बोरे बासी दिवस’ आज 1 मई को प्रदेशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इसी कड़ी में बिलासपुर के देवरीखुर्द में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का अनूठा रंग देखने को मिला, जहाँ ग्रामीणों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक साथ मिलकर ‘बासी’ का लुत्फ उठाया।


परंपरा और पोषण का अद्भुत संगम
देवरीखुर्द में आयोजित इस उत्सव में आधुनिकता की चकाचौंध को छोड़ लोग अपनी जड़ों की ओर लौटते नजर आए। कार्यक्रम की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ कांसे की थाली और मिट्टी के बर्तनों में पारंपरिक ढंग से भोजन परोसा गया।

- थाली का स्वाद: बोरे बासी के साथ चटाखेदार चटनी, ताजी भाजी, गोंदली (प्याज) और ठंडी दही का आनंद लिया गया।
- वैज्ञानिक महत्व: इस दौरान चर्चा की गई कि भीषण गर्मी में ‘बासी’ न केवल शरीर को हाइड्रेटेड रखता है, बल्कि यह विटामिन और पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत भी है।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमीन पर बैठकर साझा किया प्रेम
इस आयोजन में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी रही। ऊंच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सभी ने जमीन पर बैठकर सामूहिक भोज किया। कार्यकर्ताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री की दूरगामी सोच के कारण आज ‘बोरे बासी’ एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। यह भोजन हमारी मेहनत और छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान का प्रतीक है।
प्रमुख उपस्थिति:
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से ब्रह्मदेव सिंह ठाकुर, मनोज चक्रधारी, वहीदा खान, फरीदा बेगम, गीता सोनी, आरती ठाकुर, रजनी आगर, मंजुला रजक, बिमला पात्रे, चंद्रमुखी कश्यप, शांति, सुलोचना सिंह समेत महिला कांग्रेस की अनेक कार्यकर्ता उपस्थित रहीं।
“बोरे बासी हमारे पुरखों की विरासत है। आज जब पूरा छत्तीसगढ़ इसे एक उत्सव की तरह मना रहा है, तो हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होता है। यह न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि गर्मियों में शरीर को ठंडक देने वाला सबसे बेहतरीन आहार है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ देवरीखुर्द
कार्यक्रम के दौरान युवाओं में जबरदस्त उत्साह दिखा। लोगों ने ‘बासी तिहार’ मनाते हुए अपनी तस्वीरें और रील सोशल मीडिया पर साझा कीं, जो दिनभर चर्चा का विषय बनी रहीं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस तरह के आयोजनों से नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध संस्कृति और खान-पान के वैज्ञानिक महत्व को समझने का अवसर मिल रहा है।
निष्कर्ष: देवरीखुर्द में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक सामूहिक भोज नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी अस्मिता को पुनर्जीवित करने का एक सफल प्रयास रहा।



