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कोटा ब्लॉक में शासकीय और वन भूमि की सुरक्षा पर बड़ा सवाल लूफा के 13 एकड़ मामले के बाद कई गांवों में जमीनों के कब्जे की शिकायतें चर्चा में, व्यापक जांच की उठी मांग…

🌍 कोटा/बेलगहना (बिलासपुर)। ग्राम पंचायत लूफा में स्कूल एवं चारागाह के लिए आरक्षित बताई जा रही करीब 13 एकड़ शासकीय भूमि के रिकॉर्ड को लेकर उठे विवाद के बाद अब कोटा ब्लॉक के विभिन्न गांवों में शासकीय, राजस्व और वन भूमि की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। ग्रामीणों और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही शिकायतों में कई जगह सरकारी जमीन पर कथित कब्जे और भूमि रिकॉर्ड में गड़बड़ी की जांच की मांग की जा रही है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते राजस्व और वन विभाग द्वारा संवेदनशील भूमि का स्थल निरीक्षण, सीमांकन और रिकॉर्ड मिलान नहीं किया गया तो आने वाले समय में विवाद और बढ़ सकते हैं।लूफा मामला बना जांच का आधारलूफा में खसरा नंबर 801/1(क) से संबंधित शिकायत में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि स्कूल एवं चारागाह के लिए आरक्षित बताई जा रही भूमि के हिस्सों का नक्शा काटकर निजी नामों में प्रविष्टियां दर्ज की गईं। ग्रामीणों ने एसडीएम कोटा से मामले की जांच और शासकीय भूमि को सुरक्षित कराने की मांग की है।इस शिकायत की वास्तविकता मूल राजस्व रिकॉर्ड, नक्शा, नामांतरण आदेश, सीमांकन और स्थल जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन इस मामले ने क्षेत्र में शासकीय भूमि के रिकॉर्ड की निगरानी को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।क्या पूरे कोटा ब्लॉक का होगा भूमि रिकॉर्ड ऑडिट?स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन केवल लूफा तक सीमित न रहे। कोटा ब्लॉक के सभी गांवों में शासकीय, चरनोई, स्कूल, खेल मैदान, सड़क, निस्तार एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग की जमीनों का रिकॉर्ड ऑडिट कराया जाए।इसके साथ ही वन क्षेत्र से लगी भूमि और राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज सरकारी जमीन का भी पुराने रिकॉर्ड से वर्तमान रिकॉर्ड तक मिलान कराने की मांग उठ रही है।राजस्व विभाग के पोर्टल पर भूमि संबंधी जानकारी एवं भू-नक्शा देखने की व्यवस्था उपलब्ध है तथा राजस्व न्यायालयों के प्रकरण भी ऑनलाइन दर्ज किए जाते हैं।भूमि माफिया के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांचस्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के बीच यह चर्चा है कि क्षेत्र में जमीनों पर अवैध कब्जे और निजी हितों के लिए सरकारी भूमि के इस्तेमाल की कोशिशें बढ़ रही हैं। कुछ लोग इसे कथित भूमि माफिया के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देख रहे हैं।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। प्रशासन यदि निष्पक्ष जांच कराए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि किन जमीनों पर वास्तविक कब्जा है, कौन-सी भूमि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है और कहीं रिकॉर्ड में अनियमित प्रविष्टियां हुई हैं या नहीं।सरकार से उठी सीधी मांग—‘जमीन बचाइए, रिकॉर्ड जांचिए’ग्रामीणों की मांग है कि जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और वन विभाग संयुक्त रूप से अभियान चलाकर—- शासकीय एवं वन भूमि का स्थल सत्यापन कराएं।- पुराने और वर्तमान खसरा एवं नक्शे का मिलान कराएं।- संदिग्ध नामांतरण एवं बंटवारे की जांच कराएं।- चारागाह, स्कूल एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि को चिन्हांकित कर सुरक्षित करें।- जहां अवैध कब्जा प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई करें।- अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाए जाने पर विभागीय जांच की जाए।- जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक कर ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाए।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले में भी गोचर भूमि को राज्य की संपत्ति बताते हुए अनधिकृत कब्जे के संबंध में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।अब प्रशासन की परीक्षालूफा की 13 एकड़ जमीन को लेकर सामने आई शिकायत को एक स्थानीय विवाद मानकर छोड़ने के बजाय कोटा ब्लॉक में शासकीय एवं सार्वजनिक उपयोग की जमीनों की व्यापक जांच की जाए, तो कई वास्तविकताएं सामने आ सकती हैं।सवाल अब यही है—क्या प्रशासन शिकायतों का इंतजार करेगा या स्वयं संज्ञान लेकर कोटा ब्लॉक की शासकीय एवं वन भूमि का रिकॉर्ड और मौके की स्थिति मिलाएगा?सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है। इसकी सुरक्षा केवल राजस्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं, बल्कि मौके पर भी सुनिश्चित होना जरूरी है।