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🏠 होम › देश › नीम करौली बाबा: प्रेम और सेवा का संदेश,…

नीम करौली बाबा: प्रेम और सेवा का संदेश, जिसने सीमाएं लांघकर दुनिया को छुआ‘हनुमान अंश’ फिल्म ने फिर जगाई चर्चा, साधारण ग्रामीण युवक से विश्वभर में पूजनीय बने लक्ष्मी नारायण शर्मा उर्फ महाराज जी की जीवनगाथा पर लोगों की नजर…

🌍 नई दिल्ली/नैनीताल।लक्ष्मी नारायण शर्मा उर्फ महाराज जी, जिन्हें उत्तर भारत में नीम करौली बाबा और उत्तराखंड में श्रद्धालु प्रेम से ‘महाराज जी’ के नाम से जानते हैं, आज शरीर रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका प्रेम, सेवा और भक्ति का संदेश देश ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक हिस्सों तक पहुंच चुका है।नीम करौली बाबा के जीवन और उनके आध्यात्मिक प्रभाव को केंद्र में रखकर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने भी उनके व्यक्तित्व को एक बार फिर आम लोगों की चर्चा में ला दिया है। फिल्म के माध्यम से नई पीढ़ी तक उनके जीवन, हनुमान भक्ति और मानव सेवा से जुड़े प्रसंग पहुंच रहे हैं।साधना का संदेश बेहद सरल थानीम करौली बाबा की सबसे बड़ी विशेषता यह बताई जाती है कि उन्होंने कोई बड़ा धार्मिक संस्थान खड़ा करने या स्वयं को किसी विशेष उपाधि से स्थापित करने के बजाय प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण को जीवन का आधार बनाया।उनसे जुड़े श्रद्धालु उनके संदेश को मुख्य रूप से तीन बातों में देखते हैं—सबसे प्रेम करो।सबकी सेवा करो।ईश्वर को याद रखो।

श्रद्धालुओं में ऐसी मान्यता भी रही कि बाबा हनुमान जी के विशेष भक्त थे। अनेक भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश अथवा स्वरूप मानते रहे, जबकि बाबा स्वयं को हनुमान जी का सेवक बताते थे।साधारण जीवन से आध्यात्मिक पहचान तकउपलब्ध जीवन-वृत्तांतों के अनुसार लक्ष्मी नारायण शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद क्षेत्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कम उम्र में विवाह, युवावस्था में वैराग्य की भावना, घर से निकलकर विभिन्न स्थानों पर भ्रमण और बाद में गृहस्थ जीवन में लौटने जैसी घटनाएं उनके जीवन का हिस्सा रहीं।बाद के वर्षों में उन्होंने पूरी तरह सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया और साधना तथा सेवा के मार्ग पर आगे बढ़े।उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएं आज भी भक्तों के बीच चमत्कारिक प्रसंगों के रूप में सुनाई जाती हैं। इनमें नीम करौली स्टेशन पर ट्रेन रुकने और बाबा के दोबारा ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चलने की प्रसिद्ध कथा भी शामिल है। हालांकि ऐसे प्रसंगों को श्रद्धा और लोकविश्वास के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।कैंची धाम बना श्रद्धा का प्रमुख केंद्रउत्तराखंड का कैंची धाम आज नीम करौली बाबा की सबसे प्रमुख स्मृतियों और आध्यात्मिक विरासत से जुड़ा स्थान माना जाता है। यहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।बाबा का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंचा और पश्चिमी देशों के अनेक साधकों ने भारतीय अध्यात्म, ध्यान और भक्ति की ओर रुख किया।रिचर्ड अल्बर्ट से बने ‘रामदास’नीम करौली बाबा के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की चर्चा में अमेरिकी आध्यात्मिक साधक रिचर्ड अल्बर्ट, जिन्हें बाद में रामदास के नाम से जाना गया, का उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है।अल्बर्ट मनोविज्ञान के क्षेत्र से जुड़े थे और चेतना तथा साइकेडेलिक ड्रग्स पर प्रयोगों के कारण चर्चा में आए। भारत यात्रा के दौरान उनका संपर्क नीम करौली बाबा से हुआ और यही मुलाकात उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई।बाबा से प्रभावित होकर रिचर्ड अल्बर्ट ने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया और बाद में ‘Be Here Now’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।‘Be Here Now’ का सरल अर्थ है—“अभी, यहीं रहो।”यह पुस्तक पश्चिमी दुनिया में ध्यान, आत्मचिंतन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को समझने के लिए बेहद प्रभावशाली कृतियों में गिनी जाती है।LSD वाला प्रसंग—श्रद्धा में प्रसिद्ध, लेकिन तथ्य-जांच जरूरीनीम करौली बाबा और रिचर्ड अल्बर्ट से जुड़ी चर्चित कथाओं में LSD से संबंधित एक प्रसंग भी मिलता है। इसमें दावा किया जाता है कि बाबा ने अत्यधिक मात्रा में LSD लेने के बाद भी सामान्य अवस्था बनाए रखी और अल्बर्ट को आध्यात्मिक चेतना की शक्ति का अनुभव कराया।यह प्रसंग बाबा से जुड़ी लोकप्रिय आध्यात्मिक कथाओं में व्यापक रूप से दोहराया जाता है, लेकिन इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय बाबा की जीवनी और रामदास के संस्मरणों से जुड़ी कथा के रूप में देखना उचित होगा।स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग से भी जुड़ी बाबा की विरासतनीम करौली बाबा की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता की चर्चा में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे नाम भी सामने आते हैं।स्टीव जॉब्स भारत आए थे और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से प्रभावित हुए। वहीं मार्क जुकरबर्ग के बारे में भी यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने भारत यात्रा के दौरान कैंची धाम का दौरा किया था।इन घटनाओं ने पश्चिमी दुनिया में नीम करौली बाबा के नाम को और व्यापक पहचान दिलाने में भूमिका निभाई।बाबा आज शरीर में नहीं, लेकिन संदेश जीवित हैभारत संतों और साधुओं की भूमि रही है। यहां अलग-अलग परंपराओं में अनगिनत संतों ने अपने-अपने तरीके से समाज को रास्ता दिखाया। लेकिन नीम करौली बाबा की पहचान उनके अनुयायियों के बीच एक ऐसे संत की बनी, जिनका मूल संदेश बेहद सरल था।प्रेम करो।सेवा करो।ईश्वर को याद रखो।शायद यही कारण है कि दशकों बाद भी उनके आश्रमों में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती है और देश-विदेश में उनके नाम से आध्यात्मिक केंद्र संचालित होते हैं।फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने बाबा की जीवनगाथा को फिर से जनचर्चा में ला दिया है। फिल्म से अलग भी नीम करौली बाबा की सबसे बड़ी विरासत किसी चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि मानव सेवा, प्रेम और भक्ति का वह विचार है जो समय और सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ता है।— सत्य ज्ञान समागम न्यूज लाइव